मेरा नाम मानव है। मैं एक साधारण सा युवक हूँ जो दिल्ली के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहता हूँ। मेरी जिंदगी में रोजमर्रा की भागदौड़ है। नौकरी, घर, और कभी-कभी दोस्तों के साथ समय बिताना।
लेकिन आज का दिन कुछ खास था। सुबह से ही बारिश हो रही थी और मैं घर पर ही था। अचानक दरवाजे की घंटी बजी। मैंने सोचा शायद कोई डिलीवरी वाला होगा। लेकिन जब मैंने दरवाजा खोला तो सामने एक बेहद आकर्षक महिला खड़ी थी।
वह साँवली रंगत की थी लेकिन उसकी त्वचा इतनी चमकदार लग रही थी मानो किसी मॉडल की हो। लंबे काले बाल जो हल्के से भीगे हुए थे, बारिश की वजह से। वह एक साड़ी पहने हुए थी जो उसके कर्व्स को खूबसूरती से उभार रही थी।
साड़ी का ब्लाउज उसके स्तनों को कसकर जकड़े हुए था और कमर पर पल्लू हल्का सा सरक गया था जिससे उसकी नाभि दिख रही थी। वह मुस्कुराई और बोली,
“नमस्ते सर, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ? मैं प्रतिमा श्रीवास्तव हूँ। एक सर्वे कंपनी से आई हूँ। आपके इलाके में कुछ सवाल पूछने हैं।”
मैंने उसे देखा और मन ही मन सोचा कि यह सर्वे तो बहाना लग रहा है। लेकिन फिर भी मैंने दरवाजा खोल दिया। “हाँ जी, अंदर आइए। बारिश हो रही है ना।”
वह अंदर आई और मैंने उसे सोफे पर बिठा दिया। मैंने चाय बनाने चला गया। रसोई में खड़े होकर मैं सोच रहा था कि यह महिला इतनी सुंदर कैसे हो सकती है।
उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं, होंठ गुलाबी और मुस्कान ऐसी कि दिल धड़क जाए। चाय लेकर लौटा तो वह अपना बैग खोल रही थी।
“तो सर, आपका नाम क्या है?” उसने पूछा।
“मानव। बस मानव ही कह लीजिए। और आप प्रतिमा जी? क्या करते हैं आप?” मैंने चाय का कप उसके सामने रखते हुए कहा।
वह मुस्कुराई, “हाँ, प्रतिमा। मैं एक प्राइवेट कंपनी में काम करती हूँ। सर्वे का काम। स्वतंत्र हूँ, खुद का बॉस। घर पर पति के साथ रहती हूँ लेकिन जॉब की वजह से बाहर घूमती रहती हूँ।”
उसकी बातों में एक शरम थी जो उसे और आकर्षक बना रही थी। मैंने कहा, “वाह, स्वतंत्र महिला। अच्छा लगता है। और आपकी शादीशुदा जिंदगी कैसी चल रही है?”
वह हल्के से शरमाई, “बस वैसी ही जैसी सबकी। लेकिन कभी-कभी अकेलापन महसूस होता है। पति व्यस्त रहते हैं।”
हमारी बातें चलने लगीं। वह सर्वे के सवाल पूछ रही थी लेकिन धीरे-धीरे बातें पर्सनल हो गईं। मैंने उसकी तारीफ की, “प्रतिमा जी, आप बहुत सुंदर लग रही हैं। साड़ी आपको खूब जच रही है।”
उसके गाल लाल हो गए। “धन्यवाद मानव जी। आप भी हैंडसम लगते हैं।”
हवा में एक अजीब सा तनाव था। रासायनिक आकर्षण। मैं उसके करीब सरक गया। वह पीछे नहीं हटी। मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। “प्रतिमा, क्या मैं आपको छू सकता हूँ?”
वह साँस लेते हुए बोली, “हाँ मानव, लेकिन धीरे से।”
मैंने उसके हाथ को चूमा। फिर धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा। वह काँप रही थी लेकिन आँखों में इच्छा थी। “मानव, यह गलत तो नहीं?” उसने पूछा।
“नहीं प्रतिमा, यह तो प्यार है। आकर्षण।” मैंने कहा और उसके होंठों पर चूम लिया।
उसका जवाब गर्म चुंबन में था। हम दोनों सोफे पर लिपट गए। मेरे हाथ उसके ब्लाउज पर गए। मैंने हुक खोले। उसके स्तन बाहर आ गए। बड़े, गोल, भूरे निप्पल्स। मैंने उन्हें चूसा। वह सिसकारी भरने लगी। “आह मानव, कितना अच्छा लग रहा है।”
मैंने कहा, “प्रतिमा, तुम्हारी चूचियाँ कितनी रसीली हैं।” मेरे हाथ नीचे सरक गए। साड़ी की परतें हटाईं। उसकी चूत पर हाथ फेरा। वह गीली थी। “तुम्हारी चूत कितनी छोटी और टाइट लग रही है।”
वह हँसी, “हाँ मानव, छोटी टाइट चूत है मेरी। पति को भी मुश्किल होती है। लेकिन तुम्हें पसंद आएगी।”
मैंने अपनी पैंट उतारी। मेरा लंड खड़ा था। कड़ा और लंबा। वह उसे देखकर बोली, “वाह मानव, कितना बड़ा लंड है।”
मैंने उसे सोफे पर लिटाया। उसके पैर फैलाए। चूत पर जीभ फेरी। वह चिल्लाई, “आह, मानव, चाटो मेरी चूत।”
मैंने चाटा। उसकी चूत छोटी थी, गुलाबी, गीली। स्वाद मीठा वह मेरे बाल पकड़कर दबा रही थी। “मानव, अब डालो लंड। चोदो मुझे।”
मैंने लंड का सिरा चूत पर रगड़ा। धीरे से अंदर डाला, टाइट था मुश्किल से घुसा। वह दर्द से सिसकी, “आह, धीरे मानव। छोटी है ना।”
धीरे-धीरे पूरा अंदर। फिर धक्के मारने लगा जोरदार वह चिल्ला रही थी, “हाँ मानव, चोदो जोर से। फाड़ दो मेरी चूत।”
हमारा सेक्स तेज हो गया। पसीना बह रहा था उसके स्तन उछल रहे थे। मैंने उन्हें पकड़े। चूसा। वह उत्तेजित हो रही थी। “मानव, मैं झड़ने वाली हूँ।”
मैंने और तेज किया। वह झड़ गई चूत सिकुड़ गई। मेरा लंड दब गया मैं भी झड़ने लगा गर्म वीर्य अंदर डाला।
हम लेटे रहे। साँसें तेज। वह बोली, “मानव, कितना मजा आया। कभी इतना अच्छा नहीं हुआ।”
मैंने कहा, “प्रतिमा, यह तो शुरुआत है। और करना है।”
वह मुस्कुराई, “हाँ, करो। मेरी चूत फिर से तैयार है।”
हम उठे। बेडरूम में गए। वह नंगी हो गई। मैं भी। फिर से चूमें। मैंने उसके गाल चूसे, गर्दन, कंधे। नीचे पेट, नाभि। फिर चूत पर। वह मेरे लंड को सहला रही थी। “मानव, फिर खड़ा हो गया।”
मैंने कहा, “हाँ, तुम्हारी वजह से। अब पीछे से चोदूँ?”
वह घुटनों पर आ गई। गांड ऊपर। “हाँ, डॉगी स्टाइल में।”
मैंने पीछे से लंड डाला। चूत में जोरदार धक्के। वह चिल्ला रही थी, “आह, मानव, गहरा जा रहा है।”
मैंने उसके बाल पकड़े कमरा गूंज रहा था। ताली बज रही थी। “प्रतिमा, तुम्हारी चूत कितनी टाइट है। पकड़ रही है।”
वह बोली, “मानव, तुम्हारा लंड मोटा है। फाड़ रहा है। लेकिन मजा आ रहा है।”
फिर मैंने पोजीशन बदली। वह ऊपर आ गई खुद लंड पर बैठी। उछलने लगी उसके स्तन हिल रहे थे। मैंने पकड़े। चूसे “हाँ प्रतिमा, राइड करो।”
वह तेज हो गई। “मानव, फिर झड़ रही हूँ।”
मैं भी। दूसरी बार वीर्य डाला।
आराम किया। बातें कीं। वह बोली, “मानव, मैं शादीशुदा हूँ लेकिन पति से संतुष्ट नहीं। तुम्हारे साथ तो स्वर्ग मिल गया।”
मैंने कहा, “प्रतिमा, हम फिर मिलेंगे।”
नंबर दिया। “हाँ, कॉल करना।”
कहानी खत्म नहीं। जारी है……..