सोनगर गाँव, जौनपुर, उत्तर प्रदेश। मैं मानव, उम्र उन्नीस साल। मेरे गाँव में हर कोई जानता है कि मैं थोड़ा शरारती हूँ, लेकिन असली बात तो मेरे लंड की है। आठ इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा।
लॉकडाउन के दिनों में मैं दिन में दो-तीन बार हिलाता था। पॉर्न देख-देखकर कल्पना करता कि कोई भाभी मेरे मोटे लंड को चूस रही है। बार-बार मसलने से मेरा लंड और भी मोटा और लंबा हो गया था।
एक दोपहर पिताजी ने कहा, “मानव, भैंस के लिए घास काट ला।” मैंने साइकिल निकाली और एक किलोमीटर दूर अरहर के खेत की तरफ निकल पड़ा। दोपहर का सूरज तेज था, पसीना छूट रहा था। खेत में घुसते ही मुझे हल्की-हल्की सरसराहट सुनाई दी।
मैं घास काटने के बहाने आगे बढ़ा। अरहर के पौधे घने थे। सरसराहट बढ़ी। मैंने सावधानी से झाँका। सामने एक औरत लेटी थी। उसकी साड़ी कमर तक चढ़ी हुई थी, ब्लाउज के बटन खुले थे, दोनों स्तन बाहर निकले हुए थे।
एक हाथ से वह अपनी फुली हुई चूत को उँगलियों से रगड़ रही थी। उसकी उँगलियाँ चमक रही थीं, चूत से रस टपक रहा था।
मैंने देखा कि वह आँखें बंद किए मुँह खोले चीख-चीखकर चुदाई का मजा ले रही थी।
उसका शरीर मोटा-तगड़ा था, कमर मोटी, जाँघें मांसल, चूत के बाल घने। मैं धीरे से उसके पीछे गया। झटके से उसके दोनों स्तनों को दोनों हाथों से दबा लिया।
“आह… कौन है?” वह चौंककर बोली।
“मैं मानव हूँ, गाँव का लड़का।” मैंने जवाब दिया।
“छोड़ दे मुझे!” उसने हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैंने उसके स्तनों को और जोर से दबाया।
“भाभी, तुम्हारी चूत तो बहुत गीली है। मुझे भी चोदने दो।” मैंने सीधा प्रस्ताव रखा।
“तुम तो बच्चा हो, क्या करोगे?” वह हँसी, लेकिन जब मैंने अपनी पैंट नीचे की और मेरा आठ इंच का मोटा लंड उछलकर सामने आ गया, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“अरे वाह… इतना बड़ा!” उसने हाथ बढ़ाकर मेरे लंड को छुआ।
“नाम क्या है तुम्हारा?” मैंने पूछा।
“दीपिका।” उसने कहा।
मैंने तुरंत अपने कपड़े उतारे। दीपिका ने भी साड़ी और ब्लाउज उतार दिए। मैंने उसे उसके कपड़ों पर लिटा दिया।
सबसे पहले मैंने अपना लंड उसके दोनों स्तनों के बीच रखा और आगे-पीछे करने लगा। उसके स्तन नरम और गर्म थे। लंड की नोक उसके मुँह तक पहुँच जाती थी।
“चूसो इसे,” मैंने कहा।
दीपिका ने जीभ निकालकर मेरे लंड की नोक चाटी, फिर मुँह में लेकर चूसने लगी। मैंने उसके स्तनों को दबाते हुए जोर-जोर से चोदना शुरू किया।
कुछ देर बाद मैंने उसके मुँह से लंड निकाला और उसके होठों पर अपना मुँह रख दिया। हम दोनों गहरी चूमने लगे।
मेरी जीभ उसकी जीभ से खेल रही थी। साथ ही मैंने अपनी उँगलियाँ उसकी चूत में डाल दीं। चूत इतनी गीली थी कि उँगलियाँ आसानी से अंदर चली गईं।
“आह… मानव… उँगली मत निकालो… और अंदर डालो,” दीपिका चीखी।
मैंने तीन उँगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिलाना शुरू किया। दीपिका का शरीर काँपने लगा। उसकी चूत से रस बह रहा था।
“अब असली चोदो मुझे,” उसने कहा।
मैंने अपना मोटा लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और एक ही झटके में पूरा अंदर घुसा दिया। दीपिका चीख पड़ी।
“आह… मर गई… इतना मोटा…”
मैंने उसके दोनों पैर अपने कंधों पर रखे और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। मेरा लंड पूरी तरह अंदर-बाहर हो रहा था। दीपिका के स्तन उछल रहे थे। मैंने उन्हें मुँह में लेकर चूसना शुरू किया।
“चोदो मुझे… और जोर से… फाड़ दो मेरी चूत…” दीपिका चीख रही थी।
मैंने रफ्तार बढ़ा दी। मेरा लंड सीwing मशीन की सुई की तरह अंदर-बाहर हो रहा था। दीपिका के नाखून मेरी पीठ में गड़ गए।
“आह… आह… मैं झड़ रही हूँ…” दीपिका का शरीर काँप उठा। उसकी चूत ने मेरे लंड को कस लिया।
मैंने रुकने का नाम नहीं लिया। लगातार चोदता रहा। दीपिका तीन बार झड़ चुकी थी। उसकी चूत से सफेद रस निकल रहा था।
“अब मैं झड़ने वाला हूँ,” मैंने कहा।
“बाहर निकालो… मेरे स्तनों पर डालो,” दीपिका बोली।
मैंने लंड बाहर निकाला और जोर से हिलाते हुए उसके दोनों स्तनों पर गाढ़ा वीर्य छोड़ दिया। वीर्य उसके स्तनों, गर्दन और चेहरे पर फैल गया।
दीपिका ने मेरे लंड को हाथ में लेकर चाटना शुरू किया। उसने जीभ से मेरे लंड को साफ किया।
“गांड में डालोगे?” मैंने पूछा।
“नहीं, आज नहीं। अगली बार,” दीपिका ने कहा।
उसने जल्दी से कपड़े पहने और खेत से निकल गई। मैंने देखा कि उसकी चाल लड़खड़ा रही थी।
मैंने भी कपड़े पहने और घास काटकर घर लौट आया। पूरी रात मैं दीपिका के बारे में सोचता रहा।