दिल्ली की सड़कों पर धूप इतनी तेज थी कि पसीना निकलते ही कपड़े चिपक जाते थे। मैं नौकरी की तलाश में लाजपत नगर आ पहुँचा था। एक छोटे से अखबार के विज्ञापन ने मुझे शकुंतला देवी के घर तक पहुँचाया। वह 37 साल की विधवा थीं।
पति के गुजर जाने के बाद उन्होंने अपना बड़ा मकान किराए पर देना शुरू कर दिया था।
जब मैं पहली बार उनसे मिला तो वे गहरे हरे रंग की सूती साड़ी में थीं। उनकी लंबाई पाँच फुट छह इंच थी, गेहुँआ रंग, शरीर मांसल और भरा हुआ। पल्लू बार-बार खिसकता और उनकी गोल-गोल छातियाँ साफ दिखतीं।
ब्लाउज की ऊपरी बटनें खुली रहतीं, जिससे गोरी-गोरी चमड़ी और काली-काली निप्पल्स की झलक मिलती। मैं अक्सर घूरता रहता, मगर वे कुछ नहीं कहतीं।
घर में औपचारिक दूरी बनी रहती। वे चाय बनाकर देतीं, कमरे की सफाई करतीं, मगर बातें कम।
रात को बत्ती गुल होने पर मैं मोमबत्ती जलाता। एक बार उन्होंने कहा, “जवान उम्र है, अकेलेपन में मन नहीं लगता।” उस वाक्य ने मेरे अंदर कुछ हिला दिया।
जुलाई की एक तूफानी शाम थी। बारिश इतनी जोर से बरस रही थी कि छत पर रखे गमले बहने लगे। हम दोनों ऊपर गए और पौधों को बचाने लगे। कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे। शकुंतला की साड़ी चिपककर शरीर से चिपक गई थी।
उनके स्तन साफ उभर आए थे, निप्पल्स खड़े हो चुके थे। मैं उनकी तरफ देखता रहा। वे भी मुझे देख रही थीं।
अचानक बिजली कड़की। वे डरकर मेरी तरफ बढ़ीं और मेरी छाती से चिपक गईं। मैंने उनकी कमर पकड़ ली। गीली साड़ी के नीचे उनका शरीर गर्म था।
बिना कुछ बोले हमारे होंठ आपस में मिल गए। पहला चुम्बन गहरा था। उनकी जीभ मेरी जीभ से लिपट गई।
हम खाली स्टोररूम में घुस गए। मैंने उनका ब्लाउज उतारा। दो कसैली छातियाँ बाहर निकलीं, निप्पल्स गहरे रंग के और खड़े।
मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। शकुंतला की साँस तेज हो गई। “आह… और जोर से चूसो,” वे फुसफुसाईं।
मैंने उनकी साड़ी खोल दी। अंदर कुछ नहीं था। जांघों के बीच गीली फटी हुई चूत दिख रही थी। मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं। अंदर गर्म और चिपचिपा था।
फिर मैं घुटनों के बल बैठ गया और उनकी चूत चाटने लगा। जीभ से भग को सहलाता, फिर अंदर घुसाता।
वे मेरे बाल पकड़कर खींच रही थीं। “और अंदर… हाँ… चूसो मुझे,” उनकी आवाज काँप रही थी।
उन्होंने मुझे खड़ा किया और मेरी पैंट खोल दी। मेरा मोटा, नसों भरा लंड बाहर निकला। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और मुँह में ले लिया।
गला तक ले गईं। लंड की नसें फूल रही थीं, वे जोर-जोर से लंड चूस रही थीं। लार टपक रही थी। मैंने उनकी सिर पकड़कर आगे-पीछे करने लगा। वे गले तक लेतीं और फिर बाहर निकालतीं।
फिर मैंने उन्हें फर्श पर लिटाया। मिशनरी पोजीशन में लंड को उनकी चूत के मुँह पर रखा और जोर से धक्का मारा। पूरा लंड अंदर घुस गया।
वे चीख पड़ीं। मैं जोर-जोर से चोदने लगा। उनकी छातियाँ उछल रही थीं। मैं दोनों हाथों से उन्हें दबा रहा था।
वे ऊपर चढ़ गईं। काउगर्ल स्टाइल में मेरे लंड पर बैठ गईं। उनकी गांड आगे-पीछे हो रही थी।
स्तन उछल रहे थे। मैंने निप्पल्स को उँगलियों से दबाया और खींचा। वे जोर से चीख रही थीं। “मेरा दूध निकाल दो… चूसो…”
हमने डॉगी स्टाइल अपनाई। वे घुटनों के बल थीं, मैं पीछे से घुसा। उनकी गोल-गोल गांड पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारे। लंड और गहराई तक जाता। वे सिर नीचे करके चीख रही थीं।
आखिरकार मैंने अंदर झड़ने का फैसला किया। गर्म-गर्म वीर्य उनकी चूत में भर दिया। वे भी झड़ गईं। उनका शरीर काँप रहा था। दोनों थककर गिर पड़े।
बाद में मोमबत्ती की रोशनी में चाय पीते हुए उन्होंने बताया, “पति के बाद यह पहली बार है। मन खाली हो गया था।”
उस रात के बाद हमारी चोदाई रोज होने लगी। वे रात को मेरे कमरे आतीं। कुर्सी पर, सीढ़ियों पर, बाथरूम में, हर जगह हम चोदते।
एक दोपहर वे पारदर्शी नाइटी पहनकर आईं और मेरे ऊपर चढ़ गईं। लंड सीधा खड़ा था, उन्होंने उसे अंदर ले लिया और सवारी करने लगीं।
आखिरी रात हमने 69 पोजीशन में एक-दूसरे को चूसा। फिर हर पोजीशन आजमाई। सुबह जब मैं जाने लगा तो वे रो पड़ीं। “वापस आना,” उन्होंने कहा। मैंने वादा किया, मगर मन में सिर्फ उस बारिश वाली रात की याद रखी।