रात के दस बजे अंबाला बस स्टैंड पर ठंडी हवा चल रही थी। मुकेश ने अपना छोटा सूटकेस उठाया और आखिरी सीट की ओर बढ़ा।
बस में सिर्फ एक खाली जगह बची थी—आखिरी पंक्ति की खिड़की वाली सीट। एक औरत पहले से बैठी थी, उसके पास एक बड़ा ट्रैवल बैग रखा था।
मुकेश ने विनम्रता से कहा, “बहनजी, बैग थोड़ा हटा लें तो बैठ जाऊँ?”
कंडक्टर ने भी जोर दिया। औरत ने झिझकते हुए बैग अपने पैरों के पास रखा। मुकेश अंदर घुसा और बैठ गया।
बैग की वजह से उनकी जांघें एक-दूसरे से सट गईं। औरत की सलवार की नरम कपास उसके मोटे कपड़े से रगड़ खा रही थी।
पहले आधे घंटे तक दोनों चुप रहे। बस राजमार्ग पर दौड़ रही थी। गड्ढों में उछलने से उनकी जांघें बार-बार टकरातीं।
मुकेश ने स्वेटर उतारा तो उसकी कोहनी अनजाने में औरत की छाती से टकरा गई। उसे लगा कि ब्रा के नीचे उसकी निप्पल सख्त खड़ी है।
“सॉरी,” मुकेश ने कहा।
औरत ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “कोई बात नहीं।” फिर भी उनकी जांघें छू रही थीं।
“मेरा नाम मुकेश है,” उसने आगे बात बढ़ाई। “आप?”
“मैं रितु हूँ,” औरत ने कहा। उसकी उम्र लगभग तीस-बत्तीस लग रही थी। गोरी, सुंदर चेहरा, कद पाँच फुट चार इंच, दुबली-पतली लेकिन कमर और कूल्हों में घुमाव। गले में मंगलसूत्र साफ दिख रहा था।
“आप कहाँ जा रही हैं?” मुकेश ने पूछा।
“नोएडा। पति वहीं रहते हैं, पर साल में एक-दो बार ही मिल पाते हैं।”
बात करते-करते बस हाईवे पर पहुँच चुकी थी। सड़क पर मरम्मत का काम चल रहा था। बस बार-बार उछल रही थी।
लाइटें बंद कर दी गईं। अँधेरा छा गया। आखिरी सीटों पर सिर्फ वे दोनों ही थे। ठंड बढ़ गई। दोनों ने शॉल ओढ़ ली।
एक बड़े झटके में रितु मुकेश की तरफ झुक गई। मुकेश ने तुरंत अपना हाथ उसकी जांघ पर रख दिया।
रितु काँप गई लेकिन हटी नहीं। मुकेश ने धीरे-धीरे उसकी जांघ सहलानी शुरू कर दी।
“बहुत ठंड है ना?” उसने फुसफुसाया।
रितु ने सिर्फ “हम्म” किया।
मुकेश का हाथ आगे बढ़ा। उसने सलवार के अंदर हाथ डाला। रितु की कमर नंगी थी।
हाथ ऊपर सरकता हुआ उसके स्तनों तक पहुँच गया। ब्रा के ऊपर से उसने उन्हें दबाया। रितु की साँस फूल गई।
“कोई देख लेगा,” उसने डरते हुए कहा।
“आखिरी सीट है, अँधेरा भी है,” मुकेश ने आश्वस्त किया।
उसने ब्रा ऊपर खिसकाई और नंगे स्तनों को हाथ में लिया। उँगलियों से कड़े निप्पलों को निचोड़ा। रितु उसके कंधे पर सिर टिका कर कराहने लगी।
“महीनों से कोई छुआ तक नहीं,” उसने सिसकते हुए कहा।
मुकेश ने मंगलसूत्र को उँगली से छेड़ते हुए कहा, “ये देखो, शादीशुदा औरत होकर भी कितनी गीली हो रही हो।”
रितु की सलवार के बीचों-बीच गीला धब्बा बन चुका था। मुकेश ने वहाँ हाथ फेरा। कपड़े के ऊपर से ही उसने उसकी चूत को सहलाना शुरू कर दिया।
रितु ने उसके कंधे को काट लिया। उसका शरीर काँप उठा। चूत से रस निकलकर सलवार पूरी गीली हो गई।
रितु ने शॉल के नीचे हाथ बढ़ाया। मुकेश की पैंट का जिप खोला और उसका लंड बाहर निकाला। पाँच इंच का मोटा लंड उसके हाथ में आ गया।
“मुँह में लूँ?” रितु ने पूछा।
मुकेश ने सिर हिलाया। रितु झुक गई और पूरे लंड को मुँह में ले लिया। जीभ घुमाते हुए वह उसे गले तक ले गई। मुकेश ने उसका सिर दबाया।
“तेरा पति भी ऐसा लंड चूसता है क्या?” उसने गंदी बात कही।
रितु ने सिर हिलाया, मुँह से लंड निकालकर बोली, “नहीं, उसका छोटा और पतला है।”
मुकेश का लंड फूल रहा था। “जल्दी झड़ने वाला हूँ,” उसने चेतावनी दी।
रितु ने और तेजी से चूसना शुरू कर दिया। मुकेश का गरम-गरम वीर्य उसके मुँह में भर गया। रितु ने सब कुछ निगल लिया, फिर खिड़की से थूक दिया।
नोएडा पहुँचने पर दोनों ने नंबर एक्सचेंज किए। रितु ने कहा, “अगली बार भी यही बस, आखिरी सीट बुक कर लूँगी।”
मुकेश ने कहा, “अब अगली बार ठीक से चोदूँगा।”
रितु शरमा गई और बस से उतर गई। मुकेश आज भी जब उस बस रूट को देखता है तो उसकी याद आती है।