मैं पंजाब के मालवा इलाके का एक धनी जमींदार हूं, नाम है सुखवीर सिंह। मेरे पास फैलावदार खेत-खलिहान हैं, जो मीलों तक फैले हुए हैं। मेरी हवेली तो जैसे राजमहल है, जहां दर्जनों नौकर-चाकर काम करते हैं।
खेतों में मजदूर, हवेली में सब कुछ संभालने वाले लोग। लेकिन सबसे खास है मेरी जिंदगी का एक हिस्सा – औरतें। पंजाब में औरतों की कमी है, खासकर उन मर्दों के लिए जो जमीन के मालिक नहीं।
लेकिन मेरे लिए तो ये कोई समस्या नहीं। मैं जो चाहूं, वो हासिल कर लूं। मेरे नौकर राजा का तो जैसे कोई खास रिश्ता है मेरे साथ। वो मेरा भरोसेमंद है, खासकर सेक्स के मामलों में। राजा ने मेरी मदद से कई कन्याओं को बहकाया है, और मैंने उसके बहन को नौ साल तक चोदा था, शादी होने तक।
राजा की शादी की बात चली तो मुश्किल हो गई। पंजाब में लड़कियां कम हैं, और जमीन न होने पर कोई नहीं देता। लेकिन मैंने राजा की मदद की। दुल्हन के गरीब माता-पिता को मनाया, कहा कि राजा को नौकरी दूंगा, परिवार को रोजगार।
बस, शादी पक्की हो गई। दुल्हन का नाम सहनाज़ कौर, उम्र अठारह साल। गोरी नहीं, सांवली सलेटी रंग की, लेकिन कमाल की फिगर वाली। बड़ी-बड़ी आंखें, भारी-भरकम चूचियां, और कूल्हे ऐसे जो बाहर की तरफ निकले हुए। मैंने सोचा, ये तो किसी सर्दार के साथ रही होगी पहले, लेकिन फिर भी, मैंने आगे बढ़ा।
शादी का दिन आया। मैं खुद अपनी स्कॉर्पियो कार लेकर दुल्हन को लाने गया। उसके परिवार वाले तो खुश हो गए, इम्प्रेस हो गए। शादी की रस्में हुईं, घर में प्रवेश हुआ। पंजाब की रिवाज के मुताबिक, सुहागरात दूसरे दिन होती है, जब रिश्तेदार चले जाते हैं।
लेकिन राजा की मां ने कहा, सुखवीर साहब का एहसान है, तुरंत चुकाना चाहिए। उन्होंने सहनाज़ को मनाया कि वो अपनी सुहागरात राजा के बजाय मेरे साथ बिताए। सहनाज़ ने हिचकिचाई, लेकिन मां ने कहा, ये परिवार का फर्ज है।
रात के नौ बजे, उन्होंने मुझे कमरे में बिठा दिया। राजा की मां आईं, बोलीं, ‘साहब, आपने राजा की शादी करवाई, परिवार को नौकरी दी। ये हमारा शुक्रिया। सहनाज़ को अपनी सुहागरात के साथ लीजिए।
वो कुंवारी है, आप ही पहली बार…’ मैं हंस पड़ा। ये पहली बार था जब किसी और की बीवी को सुहागरात पर चोद रहा था। लेकिन मैंने हामी भर ली। ‘ठीक है, मां जी। मैं इसे खुश रखूंगा।’
कमरे में लालटेन जल रही थी, बिस्तर पर फूल बिछे थे। सहनाज़ शरमाते हुए आई। लाल जोड़ा पहने, दुपट्टा सिर पर। हाथ में दूध का गिलास। वो मेरे पैर छुई, बोली, ‘साहब जी, ये आपका दूध।’ मैंने उसे पास बिठाया। ‘बेटी, डर मत।
बताओ, शादी से पहले क्या-क्या किया है?’ सहनाज़ ने सिर झुका लिया। ‘साहब, कुछ नहीं। मैं कुंवारी हूं। पहले वाले मालिक के घर में काम करती थी, वो मुझे बेटी की तरह रखते थे। कोई कमी न थी, इसलिए मोटी हो गई।
‘ मैंने हंसते हुए कहा, ‘अच्छा? लेकिन इतना रसीला बदन, कोई सर्दार तो हाथ डालता ही। सच बोलो।’ वो बोली, ‘नहीं साहब, सच। गांव के लड़के-लड़कियां देखते थे, लेकिन मैंने किसी को छुआ तक नहीं।’
मैंने उसे गले लगा लिया। वो शरमा गई, चेहरा लाल हो गया। लेकिन मैंने पीछे से दीवार से सटा दिया। हाथ से उसके स्तनों को पकड़ा, निचोड़ने लगा। ‘आह साहब!’ वो चिल्लाई। मैंने उसके गांड को सहलाया, रगड़ा।
धीरे-धीरे उसके कपड़े उतारने लगा। पहले दुपट्टा, फिर ब्लाउज। चूचियां बाहर आ गईं, काले ब्रा में बंद। मैंने ब्रा खोली, नंगे स्तन चूसने लगा। ‘ओह सहनाज़, कितनी रसीली हो!’ वो सिहर गई, लेकिन धीरे-धीरे आनंद लेने लगी। ‘साहब, ये क्या कर रहे हो? राजा जी को पता चलेगा तो…’
मैंने कहा, ‘राजा को सब पता है। वो खुश है। अब चुप।’ मैंने अपना कुर्ता उतारा, पजामा। मेरा लंड बाहर आ गया, सीधा खड़ा। ‘अब इसे चूसो।’ सहनाज़ चौंक गई। ‘ये क्या साहब? मैंने कभी ऐसा नहीं किया।’ मैंने समझाया, ‘सुहागरात में ये जरूरी है।
चूसो, वरना चोदते समय दर्द होगा।’ वो घुटनों पर बैठ गई, लंड को मुंह में लेने की कोशिश की। लेकिन नया था, ठीक से न कर पाई। जीभ से चाटा, लेकिन मजा कम आया। मैंने सोचा, चोद ही लेता हूं।
उसे बिस्तर पर लिटाया। पैर फैलाए, लंड को चूत पर रखा। वो कांपने लगी। पहला धक्का मारा, टाइट थी। ‘आह!’ वो चीखी। फिर जोर से ठोका। ‘मां! मर गई मैं! फाड़ दिया! मार डाला इस अत्याचारी ने!
धीरे डालो साहब! चूत फट गई!’ मैं हंस पड़ा। मेरी तो फेम है हवेली में, ‘चीखने वाला सर्दार’। लड़कियां चीखती हैं मेरे नीचे। ये उसकी सुहागरात थी, लेकिन मैं चोद रहा था।
झटके तेज किए। वो चीखती रही, लेकिन धीरे-धीरे मजा लेने लगी। ‘हाय राम! मेरा नसीब! गांव के लड़कों से बचाया, सर्दारों से दूर रही, पति के लिए रखा, लेकिन कोई और मर्द ऊपर। धीरे साहब, रोज लेटूंगी आपके नीचे।’
चीखें कमरे में गूंज रही थीं। पंद्रह मिनट बाद, मैं झड़ने वाला था। ‘ओह सहनाज़ मेरी जान! क्या मजा दिया तेरी सील तोड़ने में! क्या जवानी है तेरी! वो सर्दार बेवकूफ था जो कुंवारी भेजा ससुराल।’ मैंने कहा, ‘अब मेरा लंड ले लो।’
वो रोई, ‘धीरे! मां, तेरी सहनाज़ चुद गई! कुंवारी चूत फाड़ दी, आह आह आह!’ मैंने अंदर झड़ दिया। वो तीन बार झड़ी थी। चादर पर खून के धब्बे, कुंवारी थी सच में। मैं खुश हो गया, पहली बार लिया उसका।
रिश्तेदार रात भर जागते रहे, चुदाई की आवाजें सुनकर। मैंने रात में तीन बार चोदा उसे। पहली बार चूत में, दूसरी बार गांड में ट्राई किया, लेकिन दर्द से चीखी, तो वापस चूत। तीसरी बार मुंह में झाड़ा।
सुबह सहनाज़ चल न पाई ठीक से। सास खुश, राजा भी खुश। राजा ने बताया, ‘साहब, सहनाज़ तो आपके पास आना ही था। लेकिन रात को मैंने उसकी मौसी को चोदा, वो मैचमेकर आंग्रेजो। कमाल की ब्लोजॉब देती है।
दोपहर हवेली छोड़ दूंगा।’ मैंने मना किया, ‘नहीं, सिर्फ सहनाज़ चाहिए। रात को फिर तैयार करो।’ फिर हवेली लौट गया।
लेकिन ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मैंने फैसला किया कि सहनाज़ को अपनी रखैल बना लूं। अगली रात फिर गया। राजा की मां ने स्वागत किया। ‘साहब, सहनाज़ तैयार है।’ कमरे में घुसा, वो शरमाई। ‘साहब, कल रात का दर्द अभी है।’
मैंने कहा, ‘आज मजा दूंगा।’ फिर गले लगाया, चूचियां चूसी। इस बार वो खुद लंड चूसने लगी, बेहतर। मैंने चोदा, धीरे-धीरे। संवाद करते रहे।
सहनाज़, कैसा लग रहा है?’ ‘साहब, दर्द तो है, लेकिन अच्छा भी। राजा जी कभी ऐसा न करेंगे।’ रात भर चुदाई।
धीरे-धीरे सहनाज़ मेरी हो गई। राजा खुश, क्योंकि परिवार को फायदा। मैं उसे हवेली में लाया। कहानी लंबी है।