नमस्ते, मैं राहुल हूँ। नागपुर का रहने वाला हूँ। उस वक्त की बात है जब रंगीन टीवी घर-घर में नहीं आए थे। हमारे घर में इकलौता रंगीन टीवी था—पड़ोस के सारे लोग शाम को ‘कर्मचंद’ और ‘रंगोली’ देखने आते थे।
उन्हीं में से एक थी सुनीता, मेरी छोटी बहन की सहेली। वह मुझे ‘भैया’ बुलाती थी और मुझसे तीन साल छोटी थी। उस समय वह नौवीं-दसवीं में होगी। कोई कल्पना नहीं थी कि वही सुनीता मेरी पहली यौन शिक्षिका बनेगी।
वह शाम थी। बिजली चली गई थी, तो हम सब बरामदे में तख्त पर बैठे टीवी देख रहे थे। मैं तख्त के एक कोने पर, सुनीता बीच में, और उसकी दादी दूसरी तरफ। अँधेरा था, सिर्फ टीवी की रोशनी थी।
सुनीता की गोद में मूंगफली का डिब्बा था। मैंने बहाना बनाया—”मूंगफली दो न”—और हाथ बढ़ाया। अँधेरे में मेरा हाथ गलती से उसकी छाती पर लग गया।
मैं चौंक गया। पहली बार किसी लड़की के स्तन छू रहा था। उसने पीली फ्रॉक पहनी थी, अंदर ब्रा नहीं। नींबू जैसी छोटी-छोटी, मुलायम कलियाँ। मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मैंने जानबूझकर फिर हाथ बढ़ाया—इस बार सीधे उसकी छाती पर।
अँगूठे से निप्पल को सहलाया। वह काँप गई। मैंने हल्के से दबाया। पूरी हथेली में भर गई। उसकी साँस रुक गई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा—उसकी दादी पास में थी।
पाँच-छः बार इस तरह मैंने उसके छोटे स्तनों को सहलाया। वह चुपचाप सहती रही। कभी-कभी वह मेरा हाथ पकड़कर हटाने की कोशिश करती, लेकिन मैं फिर लौटा देता। वह नहीं चाहती थी कि दादी को कुछ पता चले। उस रात मैं सो नहीं पाया। पहली बार किसी लड़की के सीने को छूने का एहसास।
अगले दिन सुनीता मुझसे दूर-दूर बैठी। शायद डर गई थी या शर्मा गई। मैं भी उलझन में था—क्या उसने बुरा माना? लेकिन रविवार को मौका मिल गया।
हम लोग झाँसी की रानी और रामायण देखने के बाद लुका-छिपी खेल रहे थे। सुनीता और मैं—दोनों मम्मी के अँधेरे कमरे में छिप गए।
दरवाज़ा बंद था। अँधेरा था। मेरी हिम्मत बढ़ गई। मैंने पीछे से उसे पकड़ लिया और अपनी छाती से चिपका लिया। वह हड़बड़ाई, लेकिन मैंने उसके कान में फुसफुसाया—”चुप, कोई नहीं देखेगा।
मेरे हाथ उसकी फ्रॉक के ऊपर से उसके स्तनों को दबाने लगे। उसने हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैंने फिर से कहा—”बस एक मिनट।”
फिर मैंने फ्रॉक के अंदर हाथ डाला। सीधे उसकी नंगी छाती पर। वह काँप उठी। उसकी त्वचा मुलायम, गरम। निप्पल सख्त हो गए। मैंने दोनों हाथों से उसकी छोटी-छोटी चूचियों को सहलाना शुरू किया।
“भैया… धीरे से दबाओ… दर्द होता है,” उसने फुसफुसाते हुए कहा।
“ठीक है, सुनीता। डरो मत,” मैंने जवाब दिया और उसके निप्पल को अँगूठे से हल्के-हल्के रगड़ने लगा। वह मेरे सीने में मुँह छिपाकर हाँफने लगी।
खेल दोबारा शुरू हुआ। हम फिर उसी कमरे में छिपे। इस बार मैं और बहादुर था। मैंने उसे दीवार से लगाया और सामने से उसकी फ्रॉक ऊपर उठा दी। उसकी छोटी, सफेद जाँघें दिखीं।
उसके नीचे पैंटी नहीं थी—सिर्फ सूती सलवार के अंदर नंगी चूत। मैंने अपना हाथ उसकी जाँघों के बीच डाला। उसकी चूत बिल्कुल साफ, बाल रहित, कुछ सूजी हुई।
“भैया, वहाँ पर मत करो… नीचे दर्द होता है,” उसने बेचारगी से कहा।
“बस थोड़ा सा, सुनीता। देखते हैं।”
मैंने एक उँगली उसकी चूत की सिलवटों पर फिराई। वह नम थी। फिर मैंने अंदर उँगली डाली—अंदर तक बिल्कुल सख्त, हड्डी सी लगी। वह कस गई।
“ऊँ… भैया… दर्द हो रहा है… निकाल लो,” उसने कराहते हुए कहा, लेकिन उसने मेरा हाथ नहीं खींचा।
मैंने थोड़ी देर और अंदर उँगली घुमाई। उसे कोई मज़ा नहीं आया, लेकिन मुझे जबरदस्त उत्तेजना थी। मैंने उँगली निकाल ली और फिर उसके स्तनों को सहलाने लगा।
उसके बाद हम जब भी मौका पाते, छिपकर मिलते। हर बार मैं उसकी चूचियाँ दबाता, वह बड़ी होती जा रही थीं—शायद मेरे दबाने से, या फिर उसकी उम्र से। मैं उसकी चूत में दो उँगलियाँ डालने लगा था, और अब वह उसमें मज़ा लेने लगी थी—
उसकी गीली, गरम चूत में उँगलियाँ फिसलतीं, वह हल्की-हल्की सिसकारी भरती और कभी-कभी वह मेरी लंड पर अपना हाथ रख देती। लेकिन वह डरती थी—हम दोनों को पूरी तरह से सेक्स की समझ नहीं थी। मैंने कभी उसका मुँह नहीं चूमा था। बस छूना-छूती और सहलाना।
गर्मियाँ आईं। सुनीता के मामा-मामी के बच्चे—उसके कज़िन—हमारे मोहल्ले में आए। मुंबई से समता और ममता बहनें आईं, और पुणे से काजल। समता मेरी उम्र की थी, बाकी छोटी। वे सब हमारे घर पर टीवी देखने, खेलने और कूलर के नीचे बैठने आते। हमारे परिवार एक थे, तो कोई शर्म-परहेज़ नहीं।
एक दिन टीवी के सामने तख्त पर बैठे थे। मैं सुनीता के पीछे बैठा, और उसकी चूचियाँ सहलाने लगा। सामने समता बैठी थी। उसने देखा, मुस्कुराई, और फिर वह भी मेरे पास आकर बैठ गई। उसने अपनी टाँग मेरी जाँघ से सटा दी। मेरा मन किया—यह भी तैयार है।
हम तीनों—मैं, समता और सुनीता—एक तरफ हो गए। समता ने मेरी जाँघ पर हाथ फेरा और फुसफुसाई—”भैया, तुम्हें अच्छा लगता है न?”
मैं चौंका और फुसफुसाया—”तुम सब जानती हो?”
“हाँ, मैंने देख लिया। मुझे कोई परवाह नहीं। तुम मुझे भी छू सकते हो।”
एक शाम बाद में जब सब खाना खाने के बाद बैठे थे, मैंने समता का हाथ पकड़कर रसोई के पीछे के अँधेरे गलियारे में ले गया। उसने मुझे दीवार पर पीठ टिका दी। मैंने उसकी फ्रॉक के ऊपर से उसके स्तन दबाए—संतरे के आकार के, भरे हुए। वह मुझे कसकर लग गई।
“हाँ… भैया… और जोर से दबाओ,” उसने कराहते हुए कहा।
फिर उसने मेरा चेहरा हाथों में लिया और मेरे होठों पर अपने होंठ रख दिए। मेरा पहला चुंबन था। वह चूसकर, अपनी जीभ से मेरे दाँतों को खोलती, मेरी जीभ को खींचकर अपने मुँह में लेती। मैं हक्का-बक्का था लेकिन जवाब दिया।
मैंने उसकी फ्रॉक ऊपर उठाई और सीधे उसकी चूत पर हाथ फेरा। उसकी चूत पर हल्के-हल्के बाल थे—पहली बार बालों वाली चूत छू रहा था। वह पीरियड शुरू हो चुकी थी, मुंबई में पली थी, तो सब कुछ जानती थी। मैंने उँगली डाली तो वह अंदर से मुलायम, लचीली थी—सुनीता से बिल्कुल अलग।
“अंगुली मरोड़ दो, भैया… अंदर मचाओ,” वह बोली और मेरी गर्दन पर मुँह रखकर चूसने लगी।
मैं उँगली अंदर डालकर घुमाने लगा। वह हाँफने लगी।
“बंद करो… चलो, फिर कभी। ऊपर छत पर रात को मिलेंगे,” उसने कहा और मेरी जाँघ पर एक जोरदार चुटकी काटकर भाग गई।
उस रात हम तीनों—मैं, समता और सुनीता—छत पर सोए। बाकी लोग नीचे सो गए थे। छत पर चारों तरफ चादरें बिछी थीं। लाइट बंद करने के बाद मैंने समता का संकेत पाया—उसने अपनी चादर में छेद करके हाथ बाहर निकालकर मुझे बुलाया।
मैं उसकी चादर के नीचे घुस गया। वह मुझसे चिपक गई। उसने सीधे मेरा लंड पकड़ लिया और उसे सहलाने लगी। पहली बार कोई मेरा लंड छू रहा था—जोर से, गरम हाथों से। वह ऊपर-नीचे घुमाने लगी। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा।
“समता… बहुत अच्छा लग रहा है,” मैंने फुसफुसाते हुए कहा।
“चुप रहो। बस मजे लो।”
मैंने भी उसकी चूत पर हाथ डाला। वह बिल्कुल गीली थी। मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं—वह दब गई और अपनी जीभ मेरे मुँह में डालकर गहरा चुंबन लेने लगी।
फिर उसने मेरी पैंट उतार दी, मैंने उसकी बॉटम। हम दोनों नग्न थे—ऊपर से सिर्फ कमीज या केमिज थी। वह मेरे ऊपर आ गई और उसने अपनी चूत को मेरे खड़े लंड पर रगड़ना शुरू कर दिया। मैं कोई समझ नहीं था—
अंदर डालना तो दूर, मुझे पता भी नहीं था कि ऐसा भी होता है। वह बस अपनी चूत का दरार मेरे लंड की नोक पर फेरती रही, ऊपर-नीचे हिलती रही।
“हाँ… हाँ… ऐसे… भैया… ऐसे रगड़ो,” वह बड़बड़ाई और फिर झुककर अपनी चूची का निप्पल मेरे मुँह में दे दिया। वह चने के बराबर था—छोटी सी गोली। मैंने चूसा। उसने दूसरी चूची खुद दबाई।
उसकी हरकतें तेज़ हो गईं। वह हाँफने लगी, फिर चिल्लाने लगी—”मैं आ गई… आ गई… भैया, पकड़ लो मुझे!”
उसका पूरा शरीर काँप उठा। उसने मुझे ऐसे पकड़ा जैसे डूब रही हो। मैंने महसूस किया उसकी चूत से गरम पानी सा बह रहा है—उसकी जाँघों पर लग गया। वह तेज़ी से साँस ले रही थी, मुझसे चिपकी हुई। मैं भी तन गया, लेकिन मुझे पहली बार कोई मज़ा नहीं आया—सिर्फ आराम, जैसे कोई भारी खुशी बदन में दौड़ी हो, फिर शांति।
हम एक-दूसरे से चिपके रहे। चाँद की रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था। वह मुस्कुराई और फुसफुसाई—”अगली बार तुम्हें भी आना सिखाऊँगी।”
उस रात मैं उसकी बाँहों में सो गया—पहली बार किसी लड़की के नग्न शरीर से चिपककर। नीचे चादर में सुनीता को पता था, लेकिन वह चुप थी। छत पर सन्नाटा था, सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ और दूर से कुत्तों के भौंकने की।
अगली सुबह समता और मैं बिल्कुल सामान्य थे। उसने मुझे आँख मारी और चाय बनाने चली गई। सुनीता ने मुझे घूरकर देखा—मानो सब जानती हो। मैंने उसे पास बुलाकर कहा—”सुनीता, तुमसे बाद में बात करूँगा।”
उसने सिर हिलाया और चली गई।
उस दिन के बाद कई और रातें आईं। समता ने मुझे और भी बहुत कुछ सिखाया—हाथ से, मुँह से, और शरीर से। लेकिन वह पहली रात थी जब मैंने किसी लड़की को चरम सुख तक पहुँचते देखा। वह पल मेरी ज़िंदगी का सबसे गरम और मीठा एहसास था—एक ऐसा राज जो हम तीनों के बीच में रहा, कभी किसी को नहीं पता चला।
अब भी जब मैं उन दिनों को याद करता हूँ, तो वह छत, वह चाँद, वह गरम साँसें—सब कुछ आँखों के सामने आ जाता है। पहली बार का मज़ा, छोटी-छोटी चूचियाँ, और एक लड़की का खुलकर अपनी चूत पर मेरी उँगलियाँ चलाने का साहस—यह सब मुझे हमेशा के लिए बदल गया।