टीचर प्रिया की कसी चूत फाड़ी

(Teacher Priya Ki Kasi Chut Faadi)

यह बात आज से ठीक दो साल पहले की है। उस समय मैं एक छोटे से शहर के स्कूल में कंप्यूटर टीचर था। स्कूल का नाम था सरस्वती विद्या मंदिर। वहाँ की ज़िंदगी काफी सादगी भरी थी – सुबह सात बजे पहुँचो, बच्चों को कंप्यूटर की बेसिक बातें सिखाओ, दोपहर का खाना स्टाफ रूम में सबके साथ खाओ और शाम चार बजे घर लौट जाओ।

लेकिन फिर एक दिन स्कूल में नई हिंदी टीचर आईं। उनका नाम था प्रिया। प्रिया मैम। वो जब पहली बार स्टाफ रूम में आईं, तो सबकी नज़रें उन पर टिक गईं। लंबी हाइट, गोरा रंग, लंबे काले बाल जो कमर तक लहरा रहे थे, और साड़ी पहने हुए जो उनकी कर्वी फिगर को परफेक्टली हाइलाइट कर रही थी। उनकी उम्र करीब 28 साल की होगी, शादीशुदा नहीं लग रही थीं।

मैंने जब वो जॉइन किया, तब तक मुझे उस स्कूल में करीब छह महीने हो चुके थे। पहले तो हमारी बातें बहुत औपचारिक थीं। जैसे, “सर, कंप्यूटर लैब कैसी है?” या “प्रिया मैम, हिंदी के बच्चों को कंप्यूटर क्लास में भेज रही हूँ।

धीरे-धीरे चाय के दौरान बातें बढ़ने लगीं। स्टाफ रूम में जब हम साथ बैठते, तो वो मेरे बारे में पूछतीं – मेरी पढ़ाई, मेरा घर, मेरी हॉबीज़। मैं भी उनसे हिंदी साहित्य के बारे में बात करता। “प्रिया मैम, आपकी आवाज़ में तो कोई कविता हो जाए,” मैं मज़ाक में कहता। वो हँसतीं और कहतीं, “अरे मुकेश सर, आप तो शायर निकले!”

कुछ ही दिनों में हम अच्छे दोस्त बन गए। लंच टाइम में साथ खाना, ब्रेक में गपशप। लेकिन अचानक मेरी पोस्टिंग बदल गई। दूसरे स्कूल में ट्रांसफर हो गया। मैंने प्रिया को बताया, “मैम, नया स्कूल जॉइन कर रहा हूँ।

मिलते रहेंगे।” वो उदास हो गईं, “मुकेश सर, स्कूल सूना हो जाएगा।” फिर ऐसे ही दो साल बीत गए। उन दो सालों में मैंने कभी कॉन्टैक्ट नहीं किया। ज़िंदगी की भागदौड़ में भूल गया।

फिर एक दिन मेरे नए स्कूल – शिवाजी पब्लिक स्कूल – में हिंदी टीचर ने बीच में ही रिज़ाइन कर दिया। डायरेक्टर सर ने मुझे बुलाया। “मुकेश, तुम्हें पता है कोई अच्छा हिंदी टीचर? जल्दी ढूँढो, कल से क्लास लगानी हैं।

मैंने सोचा, प्रिया! तुरंत फोन लगाया। “हैलो प्रिया मैम, मुकेश बोल रहा हूँ। याद हो? पुराने स्कूल से।” वो खुश हो गईं, “मुकेश सर! हाँ-हाँ, कैसे भूल सकती हूँ। क्या हाल?” मैंने सारी बात बताई। “मेरा स्कूल है, जॉइन करोगी?” वो हँसकर बोलीं, “बिल्कुल! डिटेल्स भेजो।” मैंने डायरेक्टर से बात करवाई। नेक्स्ट डे से वो स्कूल आने लगीं।

अब हम फिर साथ थे। लेकिन ये बार पहले जैसा नहीं था। कुछ तो बदला हुआ था।

कुछ ही दिन बीते, प्रिया की तबीयत खराब होने लगी। पीला पड़ने लगीं। चेकअप में पता चला – पीलिया। छुट्टी ले लीं। उनकी मामी ने मुझे फोन किया। “मुकेश सर, प्रिया को स्कूल ले जाया करो, ले आया करो।

अकेले बाइक पर नहीं जा पाएगी।” मैंने हामी भर ली। नेक्स्ट डे से वो मेरी बाइक पर बैठने लगीं। सुबह सात बजे घर से निकलते। रास्ते में चाय की दुकान पर रुकते। “मुकेश सर, आपकी बाइक की राइड अच्छी लगती है,” वो पीछे से हाथ मेरी कमर पर रखकर कहतीं।

मेरी कमर पर उनके नरम हाथों का स्पर्श – दिल की धड़कन बढ़ जाती। स्कूल पहुँचते तो हाथ छोड़तीं, लेकिन वो गर्माहट बनी रहती।

शाम को लौटते तो ट्रैफिक में बातें। रोज़ बातें होने लगीं। धीरे-धीरे अच्छे दोस्त बन गए। एक शाम मैसेज आया – “आई लव यू, स्वीटी।” मैं स्तब्ध। कौन भेजा? प्रिया से।

लेकिन अगले दिन जवाब दिया तो बोलीं, “मुकेश सर, गलती से फॉरवर्ड हो गया। माफ़ करना।” फिर पता चला, वो किसी और से प्यार करती हैं। शादी करना चाहती हैं। दिल टूट गया। तीन दिन चुप रहा। नॉर्मल बनने की कोशिश की। लेकिन वो फिर बात करने लगीं। “मुकेश सर, नाराज़ हो क्या?”

शायद उसके दिल में मेरे लिए कुछ था। नॉर्मल बातें शुरू हुईं। फोन पर रोज़ दो-तीन घंटे। “मुकेश, आज क्लास में क्या पढ़ाया?” “प्रिया, तुम्हारी साड़ी आज कमाल लग रही थी।” हँसी-मज़ाक होने लगा।

लेकिन मैं ज़्यादा ध्यान ना दूँ, ऐसा कोशिश करता। फिर नॉन-वेज बातें शुरू। “प्रिया, तुम्हारी कमर कितनी पतली है। छूना चाहूँ तो?” वो शरमातीं, लेकिन हँसतीं। एक दिन बोला, “किस करना चाहता हूँ।” “नहीं मुकेश, ये गलत है।” बहुत गुज़ारिश की। “ना-ना करोगी तो बात नहीं करूँगा।” वो मान गईं। “ठीक है, कल गार्डन में मिलते हैं।”

अगले दिन शाम को गार्डन। सुनसान कोना ढूँढा। हाथ पकड़ा। करीब लाया। होंठ उनके होंठों पर। वो काँप रही थीं। नरम, गीले होंठ। जीभ अंदर। वो सिसकारी लेने लगीं – “उम्म… मुकेश…” सांसें तेज़।

हाथ उनकी कमर पर। साड़ी के ऊपर से ब्लाउज़ दबाया। चूचियाँ सख्त। “प्रिया, तुम बातों से ही गरम हो जाती हो।” वो बोलीं, “हाँ मुकेश, तुम्हारी आवाज़ सुनकर ही बिखर जाती हूँ। कंट्रॉल नहीं होता।” मैंने पूछा, “कैसे?” “देखो ना, अभी भी चूत गीली हो रही है।”

उस दिन बस किस ही किया। लेकिन बातें गरम होती गईं।

तब तक रात के 11 बजे गये थे, वहाँ से निकलने के बात रात में खूब मस्ती करते हुए आए और मैंने सुनसान जगह देखकर बॉइक रोकी और उसे किस करने लगा…

उसने नहीं नहीं की पर मैं रुका नहीं!!! धीरे धीरे वो मेरा साथ देने लगी और मैं उसके चुचों को दबाने लगा…!! फिर मैंने उसका ब्लाउज खोला और उसके बूब्स को चूसने लगा और वो आह… अहह… करके सिसकारियाँ लेने लगी… मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था और वो भी मेरा साथ दे रही थी।

वो मेरे लण्ड को उपर से मसल रही थे और मेरा लण्ड कड़क होता जा रहा था!! फिर उसने मेरे लण्ड को बाहर निकाला और मेरा 10 इंच लंबा और 4 इंच मोटा ख़तरनाक लण्ड देख कर घबरा गई…!! 15 मिनिट तक वो मेरे लण्ड को चूसती रही और इस दौरान मैंने उसके साडी को उतार दिया और उसे घोड़ी बना दिया!

फिर मैं पीछे से अपने लण्ड को उसकी चूत में डालने लगा। चूत बहुत ही कसी हुई थी तो मेरा लण्ड घुस नहीं रहा था… मैंने अब ज़ोर का धक्का मारा और वो चिल्लाने लगी! मैं थोडा रुका और उसके बूब्स को दबाया, उसकी गाण्ड पर थोड़ी देर किस किया और फिर मैंने एक और धक्का मारा और लण्ड पूरा चूत में घुस गया!

उसको दर्द हुआ पर वो बर्दाशत कर गई और मेरा साथ देने लगी… अब मैं लण्ड को पूरा बाहर निकलता और फिर से अंदर डालता। उसे भी अब बहुत मज़ा आ रहा था और वो कह रही थी

चोदो और चोदो… फाड़ दो मेरी चूत को!!! फिर कुछ देर में वो अकड़ने लगी और मैंने स्पीड फास्ट कर दी… वो पानी छोड़ने लगी और साथ ही मेरा भी निकलने लगा!! मैंने अपना सारा पानी उसके चूत में छोड़ दिया और थोड़ी देर बार हमने कपड़े पहने और घर आ गये…