हेलो दोस्तों, मैं राहुल सिंह आप सभी के सामने अपनी कहानी लेकर आया हूं। यह मेरी असली सच्ची कहानी है जिसे मैं हमेशा छिपाना चाहता था। जैसा कि आप सब जानते हो कि अगर कोई कहानी यहां पर प्रकाशित हुई है तो वो सेक्स लाइफ से ही संबंधित होती है।
तो आज मैं अपनी उस ट्रेन यात्रा के बारे में बताने जा रहा हूं, जहां मेरी जिंदगी में एक ऐसी आग लग गई जो आज भी बुझी नहीं है। ये कहानी इतनी हॉट और वाइल्ड है कि पढ़ते-पढ़ते आपका लंड खड़ा हो जाएगा। तैयार हो जाओ, क्योंकि ये सिर्फ मुलाकात नहीं, बल्कि जबरदस्त चुदाई की पूरी दास्तान है।
मेरा नाम राहुल सिंह है। उम्र 25 साल, दिल्ली में रहता हूं। आईटी कंपनी में जॉब करता हूं। लाइफ नॉर्मल थी – ऑफिस, दोस्त, कभी-कभी पार्टी। लेकिन सेक्स लाइफ? वो तो बस पॉर्न वीडियो और हैंड जॉब तक सीमित थी। गर्लफ्रेंड नहीं थी, और घरवाले शादी का प्रेशर डाल रहे थे।
लेकिन एक दिन सब बदल गया। ऑफिस से मुंबई का प्रोजेक्ट आया, तुरंत जाना था। टिकट बुक करने की जल्दी में जनरल कोच का ही ले लिया, क्योंकि स्लीपर का नहीं मिला। सोचा, एक रात की यात्रा है, संभाल लूंगा।
शाम के करीब 7 बजे स्टेशन पहुंचा। मुंबई एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। भीड़ उफान पर थी – फैमिली वाले, स्टूडेंट्स, बिजनेसमैन। मैं बैग कंधे पर लटकाए कोच में चढ़ा। जनरल कोच का हाल देखा तो सिर चकरा गया। लोग इधर-उधर फैले हुए, कुछ फर्श पर लेटे, कुछ बर्थ पर चढ़े।
हवा में पसीने, चाय और खाने की महक घुली हुई। मैंने अपना टिकट चेक किया – सीट नंबर 45, विंडो साइड। मुश्किल से जगह बनाई और पहुंचा। वहां एक बूढ़ा चाचा सो रहा था, और बगल वाली सीट खाली। मैंने बैग रखा और बाहर झांका। ट्रेन सरकने लगी, व्हिसल बजी।
ट्रेन स्पीड पकड़ने लगी। मैं सीट पर बैठा, मोबाइल निकाला। सोशल मीडिया स्क्रॉल कर रहा था, लेकिन मन कहीं और था। अचानक मेरी नजर विंडो के पास वाली सीट पर पड़ी। वहां एक औरत बैठी थी, करीब 30-32 साल की। साड़ी पहने, लाल बॉर्डर वाली, जो उसके गोरे रंग पर चमक रही थी।
साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था, जिससे उसके ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा दिख रहा था। क्लीवेज की गहरी दरार, जैसे दो बड़े-बड़े आम दबे हुए हों। बाल खुले, कंधों पर लहराते। चेहरा सुंदर, आंखें बड़ी-बड़ी, होंठ मोटे और गुलाबी। वो अकेली लग रही थी, हाथ में एक छोटा बैग, और चेहरा चिंतित। शायद किसी का इंतजार कर रही हो।
मैंने सोचा, ये भाभी टाइप लग रही है। शादीशुदा, लेकिन अकेली। ट्रेन की हलचल में उसकी साड़ी और सरक गई, जांघ का हिस्सा दिखा। मेरा दिल तेज धड़का। मैंने नजरें हटाईं, लेकिन बार-बार देख रहा था।
रात हो चुकी थी, लाइट्स डिम हो गईं। कोच में लोग सोने लगे। चाचा ने मुझे धक्का दिया, ‘बेटा, जगह दो।’ मैंने शिफ्ट किया। तभी वो भाभी ने मेरी तरफ देखा। हमारी नजरें मिलीं। वो मुस्कुराई, हल्की सी। मैं भी स्माइल दी।
कुछ मिनट बाद वो उठी और मेरी तरफ आई। ‘भाई साहब, क्या आपकी सीट के पास जगह है? मेरी बेटी कहीं खो गई लगती है। लैट्रिन के पास छोड़ आई थी, अब नहीं मिल रही। मैं बहुत टेंशन में हूं।’ उसकी आवाज कांप रही थी। मैंने तुरंत कहा, ‘हां भाभी, बैठिए।
मैं मदद करूंगा। क्या हुआ, बताइए।’ वो मेरी बगल में बैठ गई। उसकी बॉडी का टच हो गया – कंधा मेरे कंधे से सटा। साड़ी से हल्की खुशबू आ रही थी, जैसे चंदन और गुलाब का मिश्रण। नाम पूछा तो बोली, ‘मैं रीता हूं। मुंबई से हूं। बेटी 5 साल की है, नाम प्रिया। ट्रेन में भीड़ में हाथ छूट गया।’
मैंने कंसोल किया, ‘चिंता मत कीजिए भाभी। अगले स्टेशन पर ऐलान करवाएंगे। या मैं ही ढूंढ लाता हूं।’ बातें शुरू हो गईं। पता चला वो विधवा है। पति की एक्सीडेंट में मौत दो साल पहले हो गई। मुंबई में अकेली रहती है, सिलाई का काम करती है।
फैमिली के पास जा रही थी, लेकिन बेटी के साथ। मैंने अपना इंट्रो दिया – राहुल, दिल्ली से, जॉब पर मुंबई। बातें करते-करते समय कट गया। रात के 10 बज चुके थे। कोच में सन्नाटा छा गया। ज्यादातर लोग सो चुके। लाइट्स और कम। रीता थकी लग रही थी।
बोली, ‘राहुल, सिर दर्द कर रहा है। थोड़ा आराम कर लूं?’ मैंने कहा, ‘भाभी, मेरी गोद में टिका लीजिए। कोई बात नहीं।’
वो हिचकिचाई, लेकिन फिर सिर मेरी जांघ पर रख दिया। उसकी सांसें गर्म मेरी पैंट पर लग रही थीं। बाल मेरी टांग पर बिखरे। मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था। लंड में हलचल होने लगी। धीरे से मैंने उसके बालों में हाथ फेरा। सॉफ्ट सिल्क जैसे। वो कुछ नहीं बोली, आंखें बंद।
हिम्मत करके कंधे पर हाथ रखा। स्किन गर्म और नरम। ट्रेन झटके से रुकी। बाहर स्टेशन था। लोग उतरने लगे। कोच आधा खाली हो गया। रीता ने सिर उठाया। ‘राहुल, डर लग रहा है। क्या तुम मेरे पास रहोगे?’ मैंने हां कहा और उसे गले लगा लिया। उसके बूब्स मेरी छाती से दबे। सॉफ्ट और भारी।
वो सिहर गई। मैंने उसके गाल पर किस किया। फिर होंठों पर। वो चौंकी, लेकिन पीछे नहीं हटी। हमारे होंठ मिल गए। मैंने जीभ अंदर डाली, चूसने लगा। वो भी रिस्पॉन्ड करने लगी। किस इंटेंस हो गया। सांसें तेज। ट्रेन फिर चल पड़ी। अब कोच में सिर्फ हम और दूर-दूर कुछ लोग।
मैंने रीता को सीट पर खींचा। साड़ी का पल्लू गिरा। ब्लाउज के बटन खोले। दो बड़े बूब्स बाहर। ब्रा में बंद, लेकिन निप्पल सख्त। मैंने ब्रा ऊपर की, चूसे। ‘आह… राहुल…’ वो सिसकी।
मेरा हाथ साड़ी के अंदर गया। पेटीकोट ऊपर। चूत पर छुआ। गीली पैंटी। उंगली अंदर डाली। चूत टाइट, गर्म। वो कसमसाई। ‘क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा।’ लेकिन रुकी नहीं। मैंने पैंटी साइड की, दो उंगलियां चूत में। अंदर-बाहर। रस बह रहा।
अब मेरा टर्न। पैंट खोली। लंड बाहर। 7 इंच लंबा, मोटा, सख्त। रीता ने देखा, आंखें चौड़ी। ‘इतना बड़ा? पति का आधा भी नहीं था।’ मैंने कहा, ‘चूसो भाभी। मुंह में लो।’ वो झुकी, लंड पकड़ा। जीभ से चाटा। फिर मुंह में। चूसने लगी। स्लॉपी आवाज। मैं बाल पकड़, गले तक ठोका।
10 मिनट चूसा। मेरा लंड चमक रहा। अब मैंने उसे लिटाया। साड़ी पूरी ऊपर। चूत पर जीभ। क्लिट चाटा। वो चीखी, ‘उफ्फ… मार डालोगे।’ उंगलियां अंदर, जीभ बाहर। उसका रस मुंह में। कमिंग होने वाली। लेकिन रुका। लंड चूत पर रगड़ा।
‘डालो ना राहुल, चोदो मुझे।’ एक झटके में पूरा अंदर। चूत फटी। खून जैसा महसूस। चोदने लगा। धीरे-धीरे, फिर तेज। ट्रेन की स्पीड से मैच। बूब्स दबाए, निप्पल काटे। ‘हां भाभी, टाइट चूत है। चोद रहा हूं।’ वो चिल्लाई, ‘जोर से, फाड़ दो।’
चोदने लगा जोरदार। ट्रेन की रफ्तार के साथ धक्के मार रहा था। उसके बूब्स दबा रहा, निप्पल चूस रहा। ‘हां भाभी, चोदो मुझे,’ वो चिल्ला रही थी। मैंने पोजीशन चेंज की, डॉगी स्टाइल में। गांड पकड़कर पीछे से पेला। लंड गहराई तक जा रहा था। स्वेट आ रहा था दोनों को।
अचानक वो कसकर चूत सिकोड़ ली। ‘आ रहा है राहुल, कमिंग!’ चिल्लाई। मैं भी रुक नहीं सका। स्पीड बढ़ाई और अंदर ही झड़ गया। गर्म वीर्य भर दिया उसकी चूत में। हम दोनों हांफ रहे थे। वो मुस्कुराई, ‘कमाल कर दिया तुमने।’
ट्रेन सुबह तक चलती रही। हमने रात भर चुदाई की। एक बार तो खड़े होकर, लंड चूसते हुए। सुबह स्टेशन आया। वो उतरी लेकिन नंबर लिया मेरा। कहा, ‘फिर मिलेंगे।’ मैं मुस्कुराया।
ये थी मेरी ट्रेन वाली भाभी वाली चुदाई। उम्मीद है आपको पसंद आई। अगर कोई सुझाव हो तो बताना।